Thursday, June 24, 2010

मेरे सपने

बंद आँखों से सपने नहीं
मैंने खुली आँखों से देखे है,
अपनी किस्मत पे नहीं
क़ाबलियत पर पासे फेंके है ,
कंकर पत्थर मुझे अपनों ने हे मारे है
इन्ही कंकर पथरो से मैंने अपने रास्ते बनाये है,
इन रास्तो में मेरे मै बिलकुल हूँ अकेली
है सपने मेरे दोस्त और कोशिश मेरी सहेली,
सबने कहा अब बस कर तू कुछ नहीं कर पायेगी
मैंने कहा अभी तो शुरुवात है अभी बहुत मुश्किलें आएँगी,
अब तो हर पल मै अपने सपनो को दोहराती हूँ
किस्मत भी मेरी बोली के रुक जा मै भी तेरे संग आती हूँ.



हरप्रीत धंजल

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