उकेर दूंगी आज
अपने हर सपने हकीक़त के
पन्नो पर,
बह जाने दूंगी
अपनी इच्छाओ के सागर को,
अपने आंसुओ की स्हाई से
कलम को भीगा दूंगी
हर अक्षरों पर
अपने रंग भर दूंगी
तितली बन जाउगी
खाव्बो के रंग बिरंगे पंख लगाकर
उड़ जाउगी
हरप्रीत धंजल
Sunday, June 27, 2010
Thursday, June 24, 2010
मेरे सपने
बंद आँखों से सपने नहीं
मैंने खुली आँखों से देखे है,
अपनी किस्मत पे नहीं
क़ाबलियत पर पासे फेंके है ,
कंकर पत्थर मुझे अपनों ने हे मारे है
इन्ही कंकर पथरो से मैंने अपने रास्ते बनाये है,
इन रास्तो में मेरे मै बिलकुल हूँ अकेली
है सपने मेरे दोस्त और कोशिश मेरी सहेली,
सबने कहा अब बस कर तू कुछ नहीं कर पायेगी
मैंने कहा अभी तो शुरुवात है अभी बहुत मुश्किलें आएँगी,
अब तो हर पल मै अपने सपनो को दोहराती हूँ
किस्मत भी मेरी बोली के रुक जा मै भी तेरे संग आती हूँ.
हरप्रीत धंजल
मैंने खुली आँखों से देखे है,
अपनी किस्मत पे नहीं
क़ाबलियत पर पासे फेंके है ,
कंकर पत्थर मुझे अपनों ने हे मारे है
इन्ही कंकर पथरो से मैंने अपने रास्ते बनाये है,
इन रास्तो में मेरे मै बिलकुल हूँ अकेली
है सपने मेरे दोस्त और कोशिश मेरी सहेली,
सबने कहा अब बस कर तू कुछ नहीं कर पायेगी
मैंने कहा अभी तो शुरुवात है अभी बहुत मुश्किलें आएँगी,
अब तो हर पल मै अपने सपनो को दोहराती हूँ
किस्मत भी मेरी बोली के रुक जा मै भी तेरे संग आती हूँ.
हरप्रीत धंजल
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