Sunday, June 27, 2010

कागज़ कलम

उकेर दूंगी आज

अपने हर सपने हकीक़त के

पन्नो पर,

बह जाने दूंगी

अपनी इच्छाओ के सागर को,

अपने आंसुओ की स्हाई से

कलम को भीगा दूंगी

हर अक्षरों पर

अपने रंग भर दूंगी
 
तितली बन जाउगी

खाव्बो के रंग बिरंगे पंख लगाकर

उड़ जाउगी




हरप्रीत धंजल

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