Sunday, August 26, 2012

ज़िन्दगी धुआ धुआ


ए ज़िन्दगी धुआ धुआ सी तू क्यों उड़ चली है
ज़रा रुक ठहर तो दो पल ज़रा कश को महसूस तो करने दे

हरप्रीत कौर

Monday, January 23, 2012

डर लगता है

आँचल में समेट लेती
हु खुद को
दुनिया की नजरो में आने से
डर लगता है,
आबरू के लुटेरे अब
हर कही बैठे है
अकेले राहो पर जाने से
 डर लगता है,
बैगानो से छुप भी जाऊ तो क्या
अब तो अपने से भी
डर लगता है,
देवी का सवरूप कहो या
कहो घर की लक्ष्मी
अब तो स्त्री होने से भी
डर लगता है


हरप्रीत धंजल