आँचल में समेट लेती
हु खुद को
दुनिया की नजरो में आने से
डर लगता है,
आबरू के लुटेरे अब
हर कही बैठे है
अकेले राहो पर जाने से
डर लगता है,
बैगानो से छुप भी जाऊ तो क्या
अब तो अपने से भी
डर लगता है,
देवी का सवरूप कहो या
कहो घर की लक्ष्मी
अब तो स्त्री होने से भी
डर लगता है
हरप्रीत धंजल