Monday, January 23, 2012

डर लगता है

आँचल में समेट लेती
हु खुद को
दुनिया की नजरो में आने से
डर लगता है,
आबरू के लुटेरे अब
हर कही बैठे है
अकेले राहो पर जाने से
 डर लगता है,
बैगानो से छुप भी जाऊ तो क्या
अब तो अपने से भी
डर लगता है,
देवी का सवरूप कहो या
कहो घर की लक्ष्मी
अब तो स्त्री होने से भी
डर लगता है


हरप्रीत धंजल

1 comment:

  1. एक भयावह वास्तविकता का उपयुक्त विष्लेषण। सामाजिक परिवेश का नारी के प्रति, उसकी हास्यास्पद एवं निंदनीय स्तथी अत्यंत सोचनीय है। अति उत्तम चरित्रण।

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