मुस्कुराती हूँ अकेली जब होती हूँ
सोच के उन बातो को
जिनसे कभी दिल दुख करता था
आसू भी गिर आते है
ये सोच कर के की
कितनी नादान थी तब
तब ये अगर पता होता तो,
तो ये आंसू आज यु ना टपकते
फिर सोचा,
सोचा के ये अनुभव भी ना हुए होते
होते तो सिर्फ कुछ नीरस ज़िन्दगी
के बिताये पल
जिन पर ना वजह होती रोने की
न बेवजह हसने की
हरप्रीत
एक रुकी हुई ज़िन्दगी, एक ठहरी हुई उम्मीद, ना रोने की वजह, ना अट्टहास की आशा,
ReplyDeleteक्या ये ज़िन्दगी कहलाने के लायक़ है?
उतार-चढ़ाव के बिना सफ़र का लुत्फ़ कहाँ?
एहसासों के रंग-बिरंगे इन्द्रधनुष के अभाव में ज़िन्दगी का असमान कितना बैरंग होता है।
बहुत उम्दा लिखा है रीत, एकबार फिर से ये एहसास हुआ, एक परिपक्व कलम से निकले शब्द कितने सटीक हैं।
thanks, your comments encouraged me to write more
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